Wednesday, October 10, 2018

ODE TO US

Nothing’s great in this story...
No princess... and no prince...
No king, no queen, and no epic...
No virtues and no sins.

This story of me and you...
It is nothing but all plain.
Like others we feel our love is great...
And our pain the only pain.

No great things we talk about...
No great feats we ever do,
No great books we’ve ever read...
And our ideas are but few.

Our films together are all banal...
Nothing deep and great...
Our series are all very different,
But still we narrate.

My verses are mediocre...
And you don’t even write.
As I speak of my childish aims...
You... of your dream last night.

We move in the same direction...
We fall, yet again we try...
And we slowly walk together...
As others pass us by.

There’s nothing great in our story,
And it may get over in a while...
But till then we sit on plastic chairs...
As we share a true smile.

~MR

Wednesday, November 1, 2017

LUCIDITY

In a moment of lucidity...
Amid their constant strikes...
You realise...
You have to rise.
You have to rise and circumvent them...
Sneak up from behind...
Put a chain around the neck,
And kick the back with full force.
That is when the neck breaks.
That is when you become you
The first murder of your life.
-MR

Tuesday, September 19, 2017

सहर-ओ-शाम

कभी सोचा न था के याद तुमको कर के सहर-ओ-शाम
यूँ हम टाला करेंगे काम सारे घर के सहर-ओ-शाम

तुम्हारे बाद घर में यूँ हमेशा आग उठ्ठेेगी 
खड़े होंगे यूँ ख़ुद बाहर हम अपने दर के सहर-ओ-शाम

सुबह उठ के ये सोचेंगे ये दुनिया छोड़ दें अब तो
सहर-ओ-शाम फिर से जी उठेंगे मर के सहर-ओ-शाम

फिर हर दिन सोच के निकलेंगे अब तुमसे करेंगे बात
वापस लौट आएँगे अकेले डर के सहर-ओ-शाम

ये मेरा घर जलेगा फिर ये मेरा सर क़लम होगा
तमाशे फिर किए जाएँगे मेरे सर के सहर-ओ-शाम

-ऋषिराज

सहर-ओ-शाम: Morning and evening
क़लम: detached, cut

Friday, April 7, 2017

THE NET

Swim in the ocean, ride the storm
It’s your choice to leave the pond

If the net hampers your vision, then
To render it invisible, look beyond.

Thursday, March 30, 2017

पैग़ाम

पहले तौबा कर चुके थे, तब गए हम जाम तक
ख़ुद कलम को तोड़ डाला आके उसके नाम तक

बस तुम्हारी बू रहेगी और कुछ भी फिर नहीं
जब अकेले जाएंगे हम ज़िन्दगी की शाम तक

जिस सफ़र की कोई मंज़िल ही नहीं हो, हमसफ़र,
उस में क्या वादे करूं मैं साथ के अंजाम तक

अख़्तरान-ओ-कहकशाँ हैं मौत के साए में सब
और तुम रक्खे हुए हो सब मेरे पैग़ाम तक

ये ज़मीं है बस जहन्नुम की ही इक तस्वीर सी
जल रहे हैं घर यहाँँ नीचे से लेकर बाम तक

Wednesday, March 8, 2017

NOMEN ILLI MORS...

The world in which I live 
is a world without an ozone armor.
It is a world of great floods…
Floods of methane, floods of fire…
The giant waves of magma at times…
And an incessant rain of different acids.

It is a world where air is laden 
very heavily with cyanide…
It is a world where day and night
Life feeds on life itself.

It is a world of endless wailing…
Constant screams, chilling cries…
It is a world where in a moment
Things reach to death and end.

A world of fear is where I live…
But a kind of fear you know not…
A fear that is red and black…
A fear that would easily kill, 
preemptively.

What do you know of the world I roam?
Nothing… Nothing at all…
Overtly we live on the same planet.
But inside I live in inferno… 

For it is me that has been spoken of…
The one that is mentioned everywhere…
The one who rides the pale horse…
The one who has become death,
the destroyer of worlds.
It is me that the walls keep…
away from your little idyllic life.
It is me who has been mentioned.
The one, whom Hades follows around.
-MR

Monday, November 21, 2016

पुराना क़स्र

अब पुरानी दोस्ती की राह हम चलते नहीं
आस्तीनें भी नहीं हैं, साँप भी पलते नहीं

 हर तरफ़ है बस अँधेरा इस पुराने क़स्र में,
अब चिराग़ों को जलाने पर भी वो जलते नहीं

Monday, October 24, 2016

मुझको अकेला कर दिया

बेक़सी की रात ने मुझको अकेला कर दिया 
दोस्ती के हाथ ने मुझको अकेला कर दिया 

तुझसे पहले थी मेरी तन्हाई मुझपे बेअसर 
देख तेरे साथ ने मुझको अकेला कर दिया 

दोस्ती के सारे वादे तूने वापस कर लिए 
तेरी हर इक बात ने मुझको अकेला कर दिया 

जांनशीं, कुछ ख़्वाब थे मिलने से पहले दिल में पर  
बस इक मुलाक़ात ने मुझको अकेला कर दिया 

ख़ैर, जाने दे, कोई तुझसे गिला मुझको नहीं 
मेरे ही हालात ने मुझको अकेला कर दिया  

Monday, September 26, 2016

देख

ख़्वाबों में मसरूफ़ है तू पर, मेरी ये बेदारी देख

मेरी रातों की स्याही में रंग ए खूं को तारी देख

देख तू मेरी ग़ुरबत को और मेरी मुर्दा आंखों को

मेरी मुर्दा आँखों से तू अब भी आंसू जारी देख

तुझको देने को है मेरे पास बता क्या? कुछ भी नहीं...

तुझसे बातें, तेरी यादें, मेरी दौलत सारी देख

मेरी जान के साथ साथ अब सारे लफ्ज़ फ़ना मेरे

इनको इक इक करके जाते, तू अब बारी बारी देख

एक तेरी तस्वीर ज़हन में, थी अपनी सारी दौलत

आज यहाँ पर खेल खेल में, हमने वो भी हारी देख

गिर्द मेरे हर जा हर दम इक शोर सुनाई देता था

ख़ामोशी भी देख ले अब तू, आकर लाश हमारी देख

Sunday, August 21, 2016

फिदायीन

रूह ओ बदन सब जान ओ दिल, आसान फ़िदा कर जाते हैं 
आते हैं कतारों में आशिक़ और जान फ़िदा कर जाते हैं 

औरों को दवाएँ हैं सारी, वो नाम तुम्हारा लेते हैं 
और नाम तुम्हारे पर अपनी पहचान फ़िदा कर जाते हैं 

जो मौत का पहरा हो तो हो, आते हैं तुम्हारे दरवाज़े 
जो भी फ़िदा हो करना फिर, इंसान फ़िदा कर जाते हैं  

अरमान दिलों में लेकर सब, आते हैं तुम्हारी उल्फ़त का 
और इश्क़ तुम्हारा पाकर सब, अरमान फ़िदा कर जाते हैं 

आते हैं तुम्हारे दरवाज़े वो मिसकीं हों या सुलतां सब 
बस शान तुम्हारी की ख़ातिर, हर शान फ़िदा कर जाते हैं 

Thursday, August 18, 2016

Love

When the mind saw no hope at all...

What moved him on was the crazy heart.

It saw oases when there was none,

And he walked through the burning sands.

Wherever he has reached today...

It was thanks to the insane love.

The irony is that the insane love

Now shows a desert in the oasis...

Love was his only weapon ever...

And now love becomes his final fall.

- Rishiraj

Sunday, August 14, 2016

JIHADI?

पलटते थे जब सारे अहबाब मेरे 
लुटते थे सामान-ओ-असबाब मेरे 
क़ातिल ने जब मुझको घेरा था तनहा 
थी हर रात तनहा, सवेरा था तनहा 
थीं साँसें भी मेरी क़ातिल के बस में 
जो गुज़री थी मुझपर मेरे कफ़स में 
जो आप देखते तो नहीं पूछते फिर 
कैसे है हाथों में शमशीर आखिर 
मैं क्यों हूँ अकेला मैं कैसे हूँ वाहिद 
क्यों हूँ मैं बाग़ी मैं क्यों हूँ मुजाहिद 

Saturday, July 23, 2016

अहले अज़ा


मेरी बातों को हर इन्सां आज नहीं कल जानेगा 
तूने न माना लेकिन मुझको सारा ज़माना मानेगा 

ख़ाक में कितने सुल्ताँ ग़ारत, कौन गिनेगा, बोल मुझे 
ख़ुद ही अपनी तारीखों की ख़ाक यहां पर छानेगा 

आँखों में हैं अश्क़ हमारी सीने पर हैं दाग़ बहुत 
अहले इश्क़ ओ अहले अज़ा को कौन नहीं पहचानेगा 

-ऋषिराज 

Saturday, July 16, 2016

तहरीर




क़ुर्बान हुई है फिर अपनी तकदीर तुम्हारे तख़्तों पर  
लिक्खी है हमारे मातम की तहरीर तुम्हारे तख़्तों पर

अब धरती सारी हिलती है, अब शोर बपा इक होता है 
होती है शुरू अब कब्रों की तामीर तुम्हारे तख़्तों पर 

ऊपर से हिदायत आई है कि जंग है लाज़िम अब तुमसे 
लिक्खेंगे लहू से हम अपनी तहरीर तुम्हारे तख़्तों पर 

ये मौत जो है हर जा बरपा, ये रक़्स तबाही का बरपा
ये होगा शुरू सब गलियों में, आख़ीर तुम्हारे तख़्तों पर  
  
अब बात तुम्हारी ख़त्म हुई और बात हमारी ख़त्म हुई,
बस बात करेगी अब अपनी शमशीर तुम्हारे तख़्तों पर 

- ऋषिराज 

Tuesday, July 5, 2016

असलियत

असलियत मेरी बहुत ही आम है
तयशुदा शुरुआत और अंजाम है
इसमें कोई भी जगह तेरी नहीं
इसलिए ये हर तरह नाकाम है
क्या सबब है इसकी मज़बूती का अब
बेवजह ये इसका इस्तेहकाम है
असलियत मेरी बहुत खामोश है
क्योंकि इससे दूर तेरा नाम है
तू नहीं है तो मुझे अय यार सुन
हर सहर इक बेकसी की शाम है
पढ़ रहा हूँ कुछ दिनों से बारहा
तेरा जो मेरे लिए पैगाम है
कुछ तो अब इस ज़ीस्त का हासिल मिले
जाने ये किस बात का हंगाम है
देख मेरी असलियत को तोड़ दे
शायद इसके बाद ही आराम है

- ऋषिराज 

Friday, June 10, 2016

I AM NOT THE MUSIC

No Ma'am, I am not the music you like...
Imagine yourself lost in a burning desert.
Imagine the winds slamming...
against all the nothingness of the desert...
And you covering yourself in your garb
trying to make some sense of the dunes...
Dunes that change places
as winds change their paces...
And in that moment you hear a great thunder.
A thunder that means death in the sands...
You hear the sound of many waters,
you see the lightning's bolt
blazing like some ancient sword...
That moment is me. That sound is me.
I am not the music that you like.

Friday, June 3, 2016

फ़क़ीर-ए-इश्क़


किले बर्बाद करता और पत्थर छोड़ जाता है...
जहां जाता है खूँ का इक समंदर छोड़ जाता है

मोहब्बत तेरी गुज़रे है मेरे दिल से, मेरे कातिल,
के जैसे लूट कर शहरों को लश्कर छोड़ जाता है

तेरी यादों को मैं लेकर कहीं भी साथ जाता हूँ
कासा अपना कब दरवेश घर पर छोड़ जाता है

ये मेरे इश्क़ की दौलत है ऊंची क़स्र-ए-सुल्तां से
जो अपनी सारी दौलत को यहीं पर छोड़ जाता है

कैसा है फ़क़ीर-ए-इश्क़ तेरे नाम का, हैदर?
मैं उसको जो भी देता हूँ वो अक्सर छोड़ जाता है

Friday, May 6, 2016

मौत से है अब हमारा साथ सुबह ओ शाम का

मौत से है अब हमारा साथ सुबह ओ शाम का 
मुंतज़िर अब है नहीं ये दिल किसी पैगाम का

हैफ़ बस कुछ देर पहले हमको था रुखसत किया  
है नहीं नाम ओ निशाँ भी अब कहीं बेनाम का 

इक तरफ है लाश बेसर इक तरफ गोर ओ कफ़न 
ग़र सभी हैं बेमकां तो क़स्र किसके काम का 

हम लटकती तेग़ को हैं देखते लैल ओ निहार 
रात दिन पढ़ते हैं नोहा आपके अंजाम का 

है अँधेरी रात और बेनूर है अब हर शमा 
चल रहे हैं नूर लेकर फिर भी उसके नाम का 

Sunday, April 24, 2016

दोस्ती

दोस्ती आह ओ फुगाँ से गुज़रेगी
कौन जाने अब कहाँ से गुज़रेगी

छोड़ दी हम ने अब गली तेरी
ख़ाक ही अब वहां से गुज़रेगी

ख़ौफ़ है हर तरफ़, जो है चर्चा
होके मौत कारवॉं से गुज़रेगी

हैं तेरे आज यहाँ क़स्र ओ महल
कल इक नदी यहाँ से गुज़रेगी

दुनिया ऐसी है दोस्त, जाने कब
ये जान अपनी जहॉँ से गुज़रेगी

Sunday, April 10, 2016

वो हमें सिखलाता है लिखना कहानी

जिसके माज़ी की नहीं कोई कहानी 
वो है सिखलाता शऊर-ए-ज़िंदगानी 

जो कभी शमशीर से खेला नहीं है 
जिसने कोई दुःख कभी झेला नहीं है 

धूप को देखा है जिसने छाँव से बस
जो नहीं धरती पे चलता पाँव से बस

है नहीं मतलब सही से और ग़लत से 
मौत देखी है मगर महलों की छत से 

रंग देखें हैं सभी, बाग़ों में जाके 
पर कभी रोया नहीं मकतल में आके 

वो है सिखलाता हमें लिखना कहानी 
वो है सिखलाता शऊर-ए-ज़िंदगानी