Friday, June 10, 2016

I AM NOT THE MUSIC

No Ma'am, I am not the music you like...
Imagine yourself lost in a burning desert.
Imagine the winds slamming...
against all the nothingness of the desert...
And you covering yourself in your garb
trying to make some sense of the dunes...
Dunes that change places
as winds change their paces...
And in that moment you hear a great thunder.
A thunder that means death in the sands...
You hear the sound of many waters,
you see the lightning's bolt
blazing like some ancient sword...
That moment is me. That sound is me.
I am not the music that you like.

Friday, June 3, 2016

फ़क़ीर-ए-इश्क़


किले बर्बाद करता और पत्थर छोड़ जाता है...
जहां जाता है खूँ का इक समंदर छोड़ जाता है

मोहब्बत तेरी गुज़रे है मेरे दिल से, मेरे कातिल,
के जैसे लूट कर शहरों को लश्कर छोड़ जाता है

तेरी यादों को मैं लेकर कहीं भी साथ जाता हूँ
कासा अपना कब दरवेश घर पर छोड़ जाता है

ये मेरे इश्क़ की दौलत है ऊंची क़स्र-ए-सुल्तां से
जो अपनी सारी दौलत को यहीं पर छोड़ जाता है

कैसा है फ़क़ीर-ए-इश्क़ तेरे नाम का, हैदर?
मैं उसको जो भी देता हूँ वो अक्सर छोड़ जाता है

Friday, May 6, 2016

मौत से है अब हमारा साथ सुबह ओ शाम का

मौत से है अब हमारा साथ सुबह ओ शाम का 
मुंतज़िर अब है नहीं ये दिल किसी पैगाम का

हैफ़ बस कुछ देर पहले हमको था रुखसत किया  
है नहीं नाम ओ निशाँ भी अब कहीं बेनाम का 

इक तरफ है लाश बेसर इक तरफ गोर ओ कफ़न 
ग़र सभी हैं बेमकां तो क़स्र किसके काम का 

हम लटकती तेग़ को हैं देखते लैल ओ निहार 
रात दिन पढ़ते हैं नोहा आपके अंजाम का 

है अँधेरी रात और बेनूर है अब हर शमा 
चल रहे हैं नूर लेकर फिर भी उसके नाम का 

Sunday, April 24, 2016

दोस्ती

दोस्ती आह ओ फुगाँ से गुज़रेगी
कौन जाने अब कहाँ से गुज़रेगी

छोड़ दी हम ने अब गली तेरी
ख़ाक ही अब वहां से गुज़रेगी

ख़ौफ़ है हर तरफ़, जो है चर्चा
होके मौत कारवॉं से गुज़रेगी

हैं तेरे आज यहाँ क़स्र ओ महल
कल इक नदी यहाँ से गुज़रेगी

दुनिया ऐसी है दोस्त, जाने कब
ये जान अपनी जहॉँ से गुज़रेगी

Sunday, April 10, 2016

वो हमें सिखलाता है लिखना कहानी

जिसके माज़ी की नहीं कोई कहानी 
वो है सिखलाता शऊर-ए-ज़िंदगानी 

जो कभी शमशीर से खेला नहीं है 
जिसने कोई दुःख कभी झेला नहीं है 

धूप को देखा है जिसने छाँव से बस
जो नहीं धरती पे चलता पाँव से बस

है नहीं मतलब सही से और ग़लत से 
मौत देखी है मगर महलों की छत से 

रंग देखें हैं सभी, बाग़ों में जाके 
पर कभी रोया नहीं मकतल में आके 

वो है सिखलाता हमें लिखना कहानी 
वो है सिखलाता शऊर-ए-ज़िंदगानी 

Tuesday, April 5, 2016

मैं करता हूँ उनको समझने की कोशिश

जुदाई के डर से नहीं प्यार करते, मैं करता हूँ उनको समझने की कोशिश
नहीं अपने दिल को जो बीमार करते, मैं करता हूँ उनको समझने की कोशिश
जो करते हैं बातें ज़मी आसमाँ  की, जो करते हैं क़िस्सा-ए-इश्क़-ओ-मुहब्बत
हदों को मगर जो नहीं पार करते, मैं करता हूँ उनको समझने की कोशिश
जो लिखते हैं अलफ़ाज़ आह-ओ-फुगाँ के, जो बनते हैं आशिक़ रू-ए-क़मर के
दामन को लेकिन नहीं तार करते, मैं करता हूँ उनको समझने की कोशिश
तारीफ़ करते हैं कुत्ब-ओ-कलम की, जो करते हैं बातें भी रंज-ओ-अलम  की
हैं अपनी मुहब्बत को बाज़ार करते, मैं करता हूँ उनको समझने की कोशिश
जो चलते हैं हमराह बनकर हमेशा, मगर साथ चलके भी हैं दूर सबसे
यारों को भी जो नहीं यार करते, मैं करता हूँ उनको समझने की कोशिश

Monday, April 4, 2016

नींद और ख़्वाब

उस काली जगह पर जाकर 
छू आए फिर उस मंज़र को 
जिस मंज़र को जब भी देखा 
जाने क्या दिल पर गुज़री है 
कुछ याद भी है, कुछ याद नहीं 
है साफ़ कहीं है धूल जमी 
पर फिर भी ये तन है लरजाँ 
जाने क्या इस पर गुज़र गई 
हम ख़ाबीदा थे कुछ कुछ तो 
कुछ याद भी है, कुछ याद नहीं 
हर तरफ़ धुआँ सा बिखरा था 
हर तरफ़ धुआं सा बिखरा है
उस काली जगह पर जाकर 
जाने क्या मंज़र देख लिया 
तूफाँ सा दिल से गुज़रा है 
कुछ कहर सा सर पर टूटा है 
कुछ दर्द भी है, कुछ आंसू भी 
कुछ धुआँ भी है और कोहरा भी
कुछ याद भी है, कुछ याद नहीं