Sunday, May 10, 2015

ग़ज़ल 3

कब तलक सुनते रहें चीखें तुम्हारे दार में 
मंज़िलें कितनी जुड़ेंगी मौत की मीनार में 

कब तलक होगा गुसल खूं से हमारे जिस्म का 
कब तलक लाशें बिकेंगी गोश्त के बाज़ार में 

कब तलक चलता रहेगा जश्न तेरी जीत का 
कब तलक रोते रहेंगे इस तरफ सब हार में 

कब तलक होगा रवाँ यूँ आपका ये कारवाँ 
कब तलक जाएंगी जानें आपकी रफ़्तार में 

कब तलक सासें हमारी यूँ खरीदी जाएंगी 
कब तलक चर्चा रहेगा आपका अख़बार में 

कब तलक चलता रहेगा मातमे मज़्लूमिअत 
कब तलक गूंजेगी क़ातिल की हंसी दरबार में 

ग़ज़ल 2

वो मुझको सहर देती है, मुझे आग़ाज़ देती है
वो मुझको इल्म देती है, अलग अंदाज़ देती है

जिन्होंने ज़िन्दगी खाई, उन्हीं माज़ी के गिद्धों को
कमी तेरी फिर इक पुरज़ोर सी परवाज़ देती है

ये तेरी याद मौसीक़ी मगर बेजानो बेमक़सद
ये मुझको रक्स देती है, मगर बेसाज़  देती है

ये सहरो रात का रोना, ये पागलपन, ये बेचैनी
न ये ख़ामोश रखती है, न ये अलफ़ाज़ देती है

कभी है बादशाहत और कभी है लाश बेपर्दा
कहीं ये मौत है देती, कहीं एजाज़ देती है

वो अब है और बस्ती में, वो अब है और दुनिया में
यहाँ से फिर गु़ज़रने पर वो क्यों आवाज़ देती है

ग़ज़ल 1

ऐसा लगता है कि कुछ होगा मगर होता नहीं
रास्ता वा है मगर अपना सफ़र होता नहीं 

वक्त की उन साअतों का भूलना पूरी तरह
उस तरफ़ तो हो गया है पर इधर होता नहीं 

इन हवाओं में वही अावाज़ उसकी है निहाँ
वो कहीं कुछ बोलता है पर नज़र होता नहीं 

है कमाल-ए-वक्त जो है अाज चर्चा आपका
वरना कोई भी यहाँ पर बाहुनर होता नहीं

इश्क में उसके ये दिल बेदार है अब इस कदर 
होश खो देता है लेकिन बेखबर होता नहीं 

दार पे चढ़ के भी उसका ज़िक्र है दर ख़ासो आम 
वो फ़ना तो हो गया है बेअसर होता नहीं 

लब्बैक या हुसैन

हर साल मुहर्रम आती है
फर्श ए अज़ा बिछ जाती है
सब जानते हैं अब ग़म होगा
हर एक तरफ मातम होगा
कुछ दिन होंगे बस अश्कों के
कुछ रातें दुःख की बीतेंगी
हर पहर अलम लहराएगा
पर पता किसे था ये कल तक
ये साल मुहर्रम का होगा
हर दिन बस नोहे गूंजेंगे
हर रात अज़ादारी होगी
ज़ंजीरज़नी तारी होगी
हर सिम्त खूंबारी होगी
बस तेरा अलम लहराएगा
हर पल बस याद दिलाएगा
तूने आवाज़ लगाई थी
अब कौन यहाँ पर आएगा
संग मेरे लहू नहाएगा
आवाज़ तेरी बस सुनते हैं
हम आज तलक ये कहते हैं
लब्बैक हुसैन 
लब्बैक हुसैन

Saturday, February 28, 2015

QUATRAINS 2015

Years have passed in constant pain
My best riders are now hurt or slain
Some battles won, some battles lost
But no battle has been fought in vain



I, really, by fire, my own fire
Flames from the inbuilt pyre
Consuming me all constantly
By and by, whole and entire


Sunday, February 15, 2015

¿Qué clima hace?

Ahora ni tú  estás interesada...
La vida está ya fría
Pero igual hablemos del pasado...
Quise decir clima.
Hablemos del clima!
-MR

MI AMOR

Mi amor...
La gente diría que te envejeciste
Yo digo eres añejo ya...
Tras haber pasado una vida de dolor
Una vida de absoluto dolor
La única que te pude dar
Mi amor...
Mi amor añejo
A lo mejor te sientas mal
A lo mejor te sientas mal
Por haberme querido
Pues He sido...
Una tortura.
Un sufrimiento...
Pero,
Ya que no tengo palabras finas
Te digo sólo estas tres...
Que suenan repetidas
y quizás aburridas
Pero te las digo de todos modos...
Te las digo ya...
"Te quiero mucho"...